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पलायन की त्रासदी शायद यह देश भूल जाएं लेकिन यें सड़कों तो इन मजदूरों को याद रखेंगी

बाकलम कपिल सूर्यवंशी reporter 2020-05-17 57
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    रेल की पटरियों पर एक और मांस के लौथडे पडे, दूसरी और खून से सनी रोटियां। एक छोटी मासूम बच्ची अंधेरी रात में चारकोल की गर्म सड़क पर नंगे पैर लंगडाते चलती जा रही है वह दर्द से चीख रही है। उसका परिवार भी साथ-साथ थका मांदा चल रहा है। ट्रक के नीचे दबे कुछ लोगों के चीथडे जमीन पर पडे हैं एक और पडी हैं सूखी रोटियां। एक मजदूर का बैल मर गया, अब घर जाने के लिए युवक खुद ही बैल बन पूरे परिवार को ढो रहा है। बीमार मॉ को कंधों पर एक बेटा खून चूस लेने वाली धूप में नंगे पैर चल रहा है, उसे घर पहुंचना।
    सीमेंट के मिक्चर में अपनी गृहस्थी लेकर कुछ मजदूर अपने घर के लिए निकले। भट्टी की तरह तपते कंटेनर में पूरा आशियाना बांधे मजदूरों का झुंड भेड-बकरियों की तरह ठसाठस भरा है। जिन्हें बस घर जाना है। जाने किस मोड पर मौत से सामना हो जाए नहीं पता।
    भूख से बिलखती एक छोटी बच्ची और मजबूर मॉ जो भूखे है उसे दूध कहां से उतरेगा। आंखों में बेबसी और चिंताएं। रो रही है, चीख रही है चिल्ला रही है। इन सड़कों पर पैदल चलते चलते न जाने कितने मजदूरों ने दम तोड दिया।
    आप और हम और यह देश भी इन मजदूरों की मौतों पर भूल जाएंगा।
    सत्ताशीर्ष जब कोई नया तमाशा लाएंगा तो इन लाशों को भूल हम फिर थाली, ताली, थमरू पीटने लगे। लेकिन ये सड़के नहीं भूलेगी, जिन्होंने इन मजदूरों का हौंसला देखा है जिनको इन मजदूरों से नंगे पैर ही नाप दिया।
    मंगलयान, चन्द्रयान वाले और मोदी के राम राज्य वाले की यह तश्वीरें हैं। भूखा भारत सड़कों पर नंगे पैर पैदल चल रहा है।
    रेल की पटरी पर मजदूरों का कट कर मर जाना महज हादसा नहीं हो सकता है, इसके पीछे राजनीति जिम्मेदार नहीं।
    इसके पीछे जिम्मेदार है हमारा समाज, हम लोग जो अंधे, गूंगे, बहरे हो चले हैं। वह मीडिल क्लास

    वर्ग समाज जिसकी संवेदनाएं शून्य हो गई हैं। जिसकी अंदर की इंसानियत मर गई है। इस समाज को पता नहीं कि राजनीतिक अंधभक्ति के इतर भी एक दूसरी दुनिया हैं जिसमें लोग रहते हैं, जिनकी कुछ जरूरतें होती है।
    यहीं अंधा समाज राजनीतिक तानाशाही को जन्म देता है। उनकी बेशर्मी और संवेदनहीनता को सर आंखों पर बिठाता है।
    तथाकथित मीडिया मोदी की चरणवंदना में लगा है। जिसने मजदूरों की समस्या से ध्यान हटाने के लिए इस कोरोना महामारी को सांप्रदायिक रंग देने की कोई कसर नहीं छोडी। भक्तों की एक लंबी सेना जो जिसे भूख प्यास से तडपते मजदूर नहीं दिखते। रेल पटरियों और सड़कों पर मजदूरों का खून नहीं दिखता। सत्ताशीर्षों के आंखों का पानी सूख चुका है और अहसास मर चुका है शायद उनके अनुशरण करने वाले मीडिल क्लास का कुछ ज्यादा ही।
    एसी बंद कमरों में गौरी चमडी वाली मंहगा मेकअप पोते ,स्कर्ट पहनी एकंर 20 लाख करोड के राहत पैकेज की गुणगान कर रही हैं। इस पैकेज में मजदूर का कितना
    हिस्सा होगा शायद ये एंकर नहीं बता पाएंगी।
    राष्ट्रनिर्माता वह मजदूर जो मेहनतकश है, चटटानों से मजबूत जिससे हौंसले हैं, जिसने संसद बनाई है, सड़कें बनाई है, बड़े बडे मॉल बनाए हैं स्कूल बनाए हैं। वह आज भूखा है परेशान है। गद्दीनसीन आज इस मेहनतकश वर्ग को भूल गए। जिस राजनीति ने जिस सिस्टम ने इन मेहनतकशों को सड़कों पर मरने को भूखा प्यासा छोड दिया ऐसे सिस्टम और ऐसे सत्ताशीर्षों पर थू है। .

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