Breaking News

नव जागरण के अग्रदूत ज्योतिबा फुले

जोरावर सिंह, लेखकreporter 2021-04-11 112
  • share on whatsapp Buffer
  • kissaago

    आज के  दिन पूरा देश महात्मा ज्योतिराव फुले की जयंती मना रहा है। ज्योतिबा फुले ने बहुजन समाज को जगाने के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया, उन्हें संविधान निर्माता डा भीमराव अंबेडकर भी अपना गुरु मानते थे।

    भारतीय समाज जब विषमताओं से भरा हुआ था, तब एक नई राेशनी के रूप में महात्मा  फुले सामने आए। इसलिए उन्हें  नव जागरण का अग्रदूत कहा जाता है।

    महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले का जन्म  11 अप्रेल- 1827  में पुणे में हुआ था।  संघर्ष तो उनके साथ बचपन में ही साथ जुड गया था, जब उनकी उम्र महज एक  साल की थी, तब उनकी मां का निधन होगया, तो उनका बचपन संघर्ष में ही बीता। माना जाता है उनका परिवार महाराष्ट्र के सतारा से पुणे आकर फूलों के गजरे आदि बनाने का काम करने लगा था।  फूलों के काराेबार के परिवार से संबंध रखने वाले फुले की पढाई मराठी में ही शुरू हुई । मगर पढाई से बीच में नाता टूट गया तो वह 21 साल की आयु में अंग्रेजी की सातवीं कक्षा की पढाई पूरी की। वहीं  1840 में सावित्री बाई से उनका विवाह हुआ। और यह महात्मा महज 63 साल की आयु पूरी कर 28 नवंबर 1890 को इस नश्वर दुनियां को अलविदा कह गया।
    उठाते रहे आवाज

    महात्मा ज्योतिबा फुले को भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों और जातिगत भेदभाव पसंद नहीं था, इसलिए  वह इसका विरोध करने लगे, तो उनके द्वारा सामाजिक कुरीतियों का विरोध करने के सामर्थ्य ने ही उन्हें समाज सुधारक, विचारक, समाजसेवी, लेखक, दार्शनिक के रूप में पहचान दिलाई।

    समाज में व्याप्त अंधविश्वास और कुरीतियों से वह इतने नाखुश  थे कि उन्होंने सितम्बर 1873 में  महाराष्ट्र में सत्य शोधक समाज नामक संस्था का की स्थापना कर दी। और इस संगठन के माध्यम से जीवन पर्यन्त समाज में व्याप्त कुप्रथाओं और जाितवाद के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करते रहे।

    शिक्षा के खोले दरवाजेमहात्मा ज्योितबा फुले जहां कुप्रथाओं के धुर विरोधी थे तो वहीं बाल विवाह का विरोध कर रहे थे, एवं विधवा विवाह का समर्थन जो उस दौर में काफी मुश्किल था, इसलिए उन्हें समाज के ठेकेदारों के कोप का भी कई बार शिकार होना पड़ा।

    वह समाज को कुप्रथा, अंधश्रद्धा की जाल से समाज को मुक्त करना चाहते थे। इसके लिए हमेशा प्रयास  रत रहे, वह महिलाओं की शिक्षा के पक्षधर रहे, जब महिलाओं के लिए शिक्षा के दरवाजे बंद तब उन्होंने महिलाओं की शिक्षा के लिए पहल की।

    इसके लिए उन्होंने अपनी पत्नी सावित्री बाई को शिक्षा प्रदान की, उन्होंने कन्याओं के लिए भारत देश की पहली पाठशाला पुणे में बनाई। लड़कियों को पढ़ाने के लिए अध्यापिका नहीं मिली तो उन्होंने कुछ दिन स्वयं यह काम करके अपनी पत्नी सावित्री फुले को ही दिया।

    महात्मा ज्योितबा फुले ने अंध विश्वास पर करारी चोट की, उन्होंने गुलामगिरी, किसान का कोडा , सहित अन्य पुस्तकें लिए, जो अंध विश्वास पर जिनहोंने करारी चोट की।  जिसने अंध विश्वास की कलई  खोलकर रख दी।  उनके द्वारा लिखा गया साहित्य अब जैसे जैसे बहुजन समाज जागृत हो रहा है, उनके सािहत्य को पढकर  उनके बताए  मार्ग पर चलने के लिए आगे आ रहा है। इसलिए ज्योतिबा फुले की जयंती पर अब देश भर में कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं तो वहीं उनके बताए मार्ग पर चलने का युवा संकल्प ले रहे है।

    लेखक- जोरावर सिंह



    .

    Similar Post You May Like