Breaking News

नारी होगी सशक्त तो मजबूत होगा हमारा लोकतंत्र

reporter 2019-04-10 795
  • share on whatsapp Buffer
  • kissaago
    • अनीता बडगुर्जर भालेराव, शिक्षाविद, मोटिवेशनल स्पीकर

    बीते लोकसभा चुनावों में महिलाओं ने बढचढ कर हिस्सा लिया है और उनकी सहभागिता भी अधिक रही। जिससे एक बात तो साफ होती है कि महिलाओं में लोकतंत्र और मतदान के प्रति जागरुकता बढी है। लोकतंत्र में महिलाओं की भूमिका और उनकी सहभागिता एक बहुत भी गंभीर विषय है। मध्यप्रदेश के सीहोर जिले में रहने वाली अनीता बडगुर्जर बालिका शिक्षा को लेकर लंबे समय से काम कर रही हैं और इसी विषय पर पीएचडी भी कर चुकी हैं। वह बालिका और महिलाओं की एक सशक्त आवाज हैं और उनके जीवन में बदलाव के लिए निरंतर कार्यरत हैं। शासकीय विद्यालय में प्राचार्य होने के साथ ही लेखकी और एक मोटिवेशनल स्पीकरभी हैं। जिन्होंने किस्सों के साथ अपने विचार साझा करते हुए बताया कि भारत विश्व का सबसे बडा लोकतांत्रिक देश है। यहां एक बार फिर हम सब लोकतंत्र का महापर्व मनाने जा रहे हैं। इस महापर्व में आधी आबादी अर्थात महिला मतदाता की और अपना ध्यान केन्द्रित करें। जिनकी भूमिका भारत के लोकतंत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण होनी चाहिए। पुरुष प्रधान देश में हर क्षेत्र में महिला पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती है वह महिला जो एक मॉ, एक बहन और एक पत्नी की भूमिका के साथ ही कृषि के क्षेत्र में, शिक्षा व व्यवसाय के क्षेत्र में अपनी अहम भूमिका रखती है। आज महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन तो हुआ है पर जिस तरह महिलाएं हर क्षेत्र में सहभागिता करती हैं। उसके हिसाब से पुरुष की तुलना में न के बराबर में परिवर्तन दिखता है। नैसर्गिक रूप से तो महिला व पुरुष एक दूसरे के पुरक कहे जाते हैं पर सामाजिक व राजनीतिक और इतिहास पर महिलाओं को कोई दावा नहीं हो सकता है। यह राष्ट्रीय वृंतांतों में भी नहीं पाया जाता है ऐसा मुझे प्रतीत होता है। भारत के पहले स्वाधिनता संग्राम 1857 से यह बात समझी जा सकती है। महारानी लक्ष्मीबाई एक प्रशासक के साथ एक अच्छी नेता और योद्धा भी थी। उनकी मुख्य छवि हमारे सामने एक वीरांगना की दिखाई जाती है। न की एक कुशल प्रशासन व नेता की।
    इसी तरह अवध की बैगम हजरत महल एक प्रखर व्यक्तित्व रखती थी जिन्होंने विक्टोरिया गदर के बाद जारी की गई घोषणा का प्रतिवाद विद्रोह पक्ष की और से जारी किया गया था। बैगम हजरत एक दक्ष राजनेता थी। अत: वर्तमान में ही नहीं बल्कि इतिहास में भी महिलाओं को अपनी सही पहचान बनाने का काफी संघर्ष करना पड़ा। भारत देश की आधी आबादी कही जानी वाली महिलाएं राजनीति में अभी हासिए पर हैं। जबकि भारत की महिलाओं को निछले पाएदान से ऊपरी पायदान तक जब भी अवसर मिला है उन्होंने अपनी काबलियत की छाप छोडी है। फिर चाहे इंदिरा गांधी, विजय लक्ष्मी पंडित, सरोजनी नायडू या प्रतिभा पाटिल हो। सभी कठिनाई और परेशानियों के बावजूद भारत की महिलाएं राजनीति में आई और सरकारों का नेतृत्व भी किया। संसद और विधानसभा में गंभीर विषयों पर अपनी बात रखी और उचित निर्णय लिया उसके बावजूद आज भी भारतीय राजनीति में काफी हद तक पुरुषवादी सोच ही हावी है। राजनीतिक दलों के द्वार उनके एजेंडे में महिलाओं के मुददे काफी पीछे रह जाते हैं। इसके पीछे की सोच यह है कि महिलाओं को देश में वोट बैंक के तौर पर देखा जाता है। ज्यादातर महिलाएं अपने घर के पुरुषों के कहे अनुसार अपने मत का प्रयोग करती हैं। स्वतंत्रता से पहले ही देश में पहली बार 1917 में राजनीति में महिलाओं की भागीदारी की मांग उठी थी जिसके बाद वर्ष 1930 में पहली बार महिलाओं को मुख्यमंत्री, लोकसभा में विपक्ष की नेता और लोकसभा अध्यक्ष के साथ-साथ अन्य कई महत्वपूर्ण पदों पर आसिन रही हैं। उसके बाद भी हर स्तर पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम रहा है। जब देश की राजनीति और महत्वपूर्ण मुददों व फैसलों पर निर्णय लेने की बारी आती है तो महिलाओं की भूमिका नहीं के बराबर रहती है। महिलाओं को आरक्षण को आभार पर विजयश्री तो मिल जाती है,पद मिल जाता है लेकिन उन पदों पर पूरा संचालक महिलाओं के पति द्वारा किया जाता है। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षिक आयोग की सदस्य डा शहिस्ता गफूर बताती हैं कि आज भी गरीबी शिक्षा में कमी या फिर पिछडे समाज की वजह से महिलाएं आगे नहीं आ पा रही हैं। उनके अनुसार महिलाएं आगे यदि आती भी हैं तो उसके पीछे किसी पुरुष का हाथ होता है। अपने बलबूते पर समाज में ऊपर आना उनके लिए संभव नहीं हो पाता। लेकिन जबसे आधुनिक राष्ट्र में परिवर्तन की प्रक्रिया आरंभ हुई है तब से भारत देश की महिलाओं की भारत देश में सक्रियता बडी है। बडे शहरों में कार्पोरेट जगत में धीरे-धीरे महिलाएं पुरुषों के बराबर अपनी जगह बनाने में सफल हुई हैं। भारत की राजनीति में शुरु से महिलाओं की मौजूदगी कम बेशक रही है परन्तु आज का सच यह है कि महिलाओं में अपने लोकतंत्र के प्रति रुझान व जागरुकता तेजी से पनप रहा है। जिसका प्रमाण पिछले कुछ चुनावी आंकडों से आया है सामाजिक जीवन में लंबे समय से हाशिए पर रही महिलाओं को मतदाता के तौर पर अहमियत मिलने लगी है इससे पता लगता है कि महिलाएं सशक्त हुई हैं और राजनीति में महिलाओं की स्थिति बदल चुकी है। सभी का ध्यान इस लोकतंत्र में महिला मतदाताओं की और आकर्षित होने लगा है क्योंकि गत वर्ष के मतदान में महिला मतदाताओं की संख्या और मतदान में उनकी हिस्सेदारी बढी है। एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत के 16 राज्य में महिला मतदाताओं की मतदान में संख्या पुरूष मतदाताओं से अधिक है। वहां का विकास भी अन्य राज्यों की तुलना में तेजी से हो रहा है। महिलाओं की सक्रियता हमारे लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत हैं। लोकनीति सेंटर फार द स्टडी आफ डेवलपिंग सोसायटी जो लोकतांत्रिक राजनीति पर अध्यन करता है का कहना है कि मतदान में महिलाओं की बढती हिस्सेदारी स्थापित सत्य है अर्थात लोकतंत्र के इस महापर्व पर्व में महिलाओं की भूमिका को हमे सहर्ष सम्मान के साथ स्वीकारना होगा। अब हम कह सकते हैं कि भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की भूमिका अविश्वसनीय है अगर हम एक वाक्य में कहें तो यह कहना उचित होगा की मजबूत लोकतंत्र सशक्त व मजबूत नारी से ही बनेगा क्योकि कोई भी देश तरक्की के शिखर पर तब तक नहीं पहुंच सकता जब तक महिलाएं पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर न चलें।
    .

    Similar Post You May Like