Breaking News

एक मुर्गे की बांग और बिखरता लोकतंत्र

reporter 2019-09-12 160
  • share on whatsapp Buffer
  • kissaago
    • छाया-सोशल मीडिया साभार।

    बिल्ली करती है मियाउ मियाउ, कुत्ता भो-भो, मेंढक टर्र टर्र, गाय के बोलने को रंभाना कहते है और भी पशु-पक्षी बोलते हैं। जिनको कोयल का गाना और चिड़ियों का चहचहाना मन को सुकून देता है। प्रकृति ने इंसान, जानवर या फिर पक्षी सभी को ध्वनि दी है। कुछ पक्षीयों की ध्वनि से मधुर संगीत पैदा होता है। कोयल की आवाज पर बॉलीवुड में अनेकों गीत लिखे गए। ऐसे ही मुर्गा बोलता है कुकड़ूँ कुडू, जिसे बांग देना कहते हैं।
    क्या बांग देने के कारण किसी मुर्गे को कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ सकते हैं। हा फ्रांस में ऐसा हुआ है और कोर्ट में मौरिस नामक मुर्गे ने केस भी जीता। मुर्गे के केस जीतने की कहानी एक बड़ी मिसाल है तो किसी भी देश की आवाम के लिए एक प्रेरणादायक बात जो नागरिकों को अधिकारों के लिए लड़ने की ताकत देगी। मामला फ्रांस के गांव ओलोंन का है जहाँ ज्यां लुईस बिहान नामक एक व्यक्ति ने पड़ोसी क्रोनी और उसके मुर्गे मौरिस के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। शिकायत थी कि मुर्गे की बांग के कारण उनकी नींद में खलल होती है, इसलिए मुर्गे को मार देना चाहिए और उसके मालिक पर जुर्माना लगाया जाना चाहिए।
    मामला कोर्ट पहुँचा और एक मुर्गे की बांग राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन गया। मतलब यहा बांग से नही। मतलब है आज़ादी, अभिव्यक्ति और प्रकृति से है। फ्रांस में शहरी लोग गांव में घर खरीद लेते हैं जो इन गांव में छुट्टियां मनाने जाते हैं। ओलोंन गांव में भी सैकड़ो शहरी लोगों ने घर खरीद रखे हैं।
    मुर्गे के केस में शहरी और ग्रामीण समुदाय दोनों दो भागों में बंट गए और मुर्गे की बांग फ्रांस के अखबार हेडलाइन और चैनलों की डिबेट का विषय बन गया।
    देखते ही देखते लाखों लोग मौरिस के समर्थन में आ गए, पत्रकार, सोशलवर्कर, स्कूल-कॉलेज के स्टूडेंट्स ने सड़कों पर उतरकर मांग रखी कि बांग देना मुर्गे का अधिकार है और यह उसकी अभिव्यक्ति है जिसे कोई छीन नही सकता। मुर्गे के समर्थन में कोर्ट में एक ऑनलाइन याचिका भी दायर की गई। हस्ताक्षर अभियान चलाया गया जिसमें 40 लाख लोगों ने हस्ताक्षर किए।
    सेव मौरिस वाली शर्ट पहनकर लोग सड़कों पर घूम रहे थे। सुनने में और पढ़ने में कितना अजीब लगता है न यह सब एक मुर्गे के लिए। मुर्गे को बचाने पूरा देश एक जुट हो गया।
    जरा अपने मुल्क के हालातों पर भी नजर करते हैं यहाँ धर्म के नाम पर, गाय के नाम पर एक मजहब के लोगो को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। बेकाबू और उन्मादी भीड़
    कब हत्यारी हो जाए। वोटों की फसल काटने लोगों के दिलों में नफरत के बीज बोए जा रहे हैं। पार्टी विषय का समर्थन करने वाला देशभक्त और राष्ट्रवादी है। सत्ता पर सवाल उठाने वाला देशद्रोही करार दे दिया जाता है।
    इस अंधभक्ति में आत्मा को मार दिया। तर्क और विवेक को भी मार दिया।
    कोई सवाल नही पूछता की बेरोजगारी क्यो है।
    मोदी सरकार के गलत फैसले नोटबंदी और जीएसटी के कारण देश आर्थिक मंदी से गुजर रहा है। उद्योग-धंधे चौपट है, मिलों से वर्करों को निकाला जा रहा है।
    शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर बात नही होती। चिंता गाय की है।
    सरकारी अस्पताल जहाँ ईलाज के आभाव में रोजाना सैकड़ो जाने जाती हैं।
    अमीर का बच्चा महंगे स्कूल में और गरीब का सरकारी ऐसा क्यों? असमानता आखिर क्यों है?
    गरीबी और अमीरी की खाई जो कम होना थी बढ़ती ही जा रही है क्यो? युवा बेरोजगार है लेकिन सड़कों पर नही आता टिक-टॉक बनाने में व्यस्त है। शायद उसे अहसास ही नही कि देश किस और जा रहा है। बैंक कर्ज में डूबे हैं जिनका विलय होने लगा है। फिर भी भक्तों कह रहे हैं कि मोदी है तो मुमकिन है।
    दुःखद बात तो यह है कि संविधान का चौथा स्तम्भ कहलाने वाला मीडिया जिसका काम आईना दिखाना, आवाम को जागरूक करने का है वह भी सत्ता की चरण वंदना में लगा है ने खुद को सत्ता से समझौता ही नही किया बल्कि पूरा बेच दिया। गाय, गोबर, पाकिस्तान, राष्ट्रवाद जैसे नकली मुद्दे रोजाना परोस परोस कर लोगों का आदी किया गया और डर, भय का माहौल बनाया जाता है।
    अलग अलग जाती, धर्म और सम्प्रदाय के लोगों से मिलकर यह देश बना है जहाँ विभिन्न प्रकार की संस्कृति को मानने वाले लोग साथ रहते हुए आए हैं। अनेकता में एकता इस देश की खूबसूरती है। अब फिजाएं बदल गई हैं और इस सुंदर सूरत को बदरंग और कुरूप बना दिया है।
    दोष किसका हो सकता है ?
    -------- बाकलम कपिल सूर्यवंशी.

    फ्रांस के कोर्ट ने बीते गुरुवार 6 सितंबर को इस पूरे मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है जिसमे मुर्ग़े मौरिस ओर उसके मालिक क्रोनी की जीत हुई है। फ्रांस कोर्ट ने कहा है कि बोलना पक्षी का अधिकार है सुबह बांग देना उसकी अभिव्यक्ति की आजादी का हक है। कोर्ट ने मुर्गे के खिलाफ केस दर्ज कराने वाले के खिलाफ भी जुर्माना किया है। वाकई में एक पक्षी के अधिकारों के लिए पूरा देश सड़कों पर आ गया। दुनिया का बड़ा लोकतंत्र भारत का युवा क्यो आंख पर पट्टी बांध कर चिर निंद्रा में है ?

    समाजवाद की पैरवी करने वाले महान नेता डॉ राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि
    जब सड़कें सुनी हो जाएंगी तो संसद आवारा हो जाएगी।
    मशहूर कवि पाश ने कहा था सबसे बुरा होता है -- सपनों का मर जाना।
    लगता है इस देश में अब कोई सपने नही देखता। जब बेरोजगारी में मजा आने लगे यो रोजगार खोजने कौन निकले। फ्रांस में एक मुर्गे के अधिकार के लिए पूरा देश सड़कों पर आ गया और यहाँ अपने अधिकारों के लिए भी उठने की कोशिश नही की। उन्मादी भीड़ ने सड़को पर किसी का खून बहाया तो मुझे क्या!
    सड़क में गडढे हैं कभी तो भर जाएंगे,
    बाबू रिश्वत मंगता है वो अच्छा है पर सत्ता पर सवाल उठाने वाला देशद्रोही।

    Similar Post You May Like